प्रेस विज्ञप्ति: दिसम्बर १८ , २०११ (हिंदी)

Dec 19, 2011 Comments Off by

हिंदी के पाठक तक पहुँचने की जरूरत है

हिंदी में नए पाठक की खोज पर प्रकाशकों, लेखकों और सम्पादकों के बीच चर्चा के साथ रविवार शाम को ‘समन्वय’ आईएचसी भारतीय भाषा महोत्सव सम्पन्न हुआ। समारोह के समापन की घोषणा करते हुए इंडिया हैबिटाट सेंटर के निदेशक राज लिब्रहान ने घोषणा की कि अगले साल नवम्बर में फिर से इस महोत्सव का आयोजन किया जाएगा।

नई सदी में पाठक की खोज पर चर्चा करते हुए वक्ताओं ने कहा कि हिंदी में पाठक है, लेकिन उस तक पहुंचने की कोशिश करने की जरूरत है। एनडीटीवी के रविश कुमार ने कहा कि टीवी ने अपने लिए सुपर दर्शक खोज लिया है लेकिन किताबे अपने लिए सुपर पाठक खोजने में नाकामयाब रही हैं। संभवतः इसके लिए लेखक, प्रकाशक और वितरक सभी की बराबर जिम्मेदारी है। कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि प्रकाशकों की चिंता पाठक नहीं खरीदार की है। उन्होंने कहा कि हिंदी में किताबों के दाम पाठक की खरीद की क्षमता को ध्यान में रख कर रखे जाने चाहिए। चर्चा में हंस के संपादक राजेंद्र यादव, दिल्ली प्रेस के अध्यक्ष परेश नाथ, वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी, पेंग्विन हिंदी की नीता गुप्ता, प्रतिलिपि के संपादक गिरिराज किराड़ू, ने भाग लिया। संत्र का संचालन दिल्ली प्रेस के सत्यानंद निरुपम ने किया। इस सत्र के आरंभ में कवि महेश वर्मा ने अपनी कविताओं का और प्रभात रंजन ने अपनी पुस्तक ‘बदनाम बस्तियां’ के अंश का पाठ किया।

बांग्ला भाषा के सत्र में कविता और लोकप्रियता पर नवारुण भट्टाचार्य, सुबोध सरकार, उज्जल सिन्हा, और सृजातो ने बातचीत की और अपनी रचनाओं का पाठ किया। इस सत्र का संचालन डा. परोमिता चक्रवर्ती ने किया।

सुबह के सत्रों में तमिल और अंग्रेजी के साहित्यकारों ने लेखन के अपने अनुभवों का साझा किया। ‘स्त्री लेखन में देह’ इस विषय पर चर्चा करते हुए तमिल कवयित्री कुट्टी रेवती ने कहा कि जाति और वर्ग में बंटे भारतीय समाज में देह स्त्री के सम्मिलित स्व को अभिव्यक्त करती है। सत्र में शामिल सभी दलित स्त्री लेखिकाओं ने इस बात को रेखांकित किया कि उनकी कविताएं स्त्री और दलित के रूप में उनके भोगे भेदभावपूर्ण यथार्थ के प्रति प्रतिरोध को दर्ज करती हैं और देह उनके इस प्रतिरोध को दर्ज करने का माध्यम है। सत्र का संचालन वरिष्ठ तमिल कवयित्री पी. शिवाकामी ने किया। सलमा, मालती मैत्री, सुकीर्तिरानी और कुट्टी रेवती ने चर्चा में भागीदारी की और तमिल में अपनी कविताओं का पाठ किया। अंग्रजी लेखिका अरुंधती सुब्रमण्यम और अर्शिया सत्तार ने इन कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद का पाठ किया।

‘गल्प से परे: भारतीय अंग्रेजी लेखन की दुनिया’ पर चर्चा करते हुए अर्शिया सत्तार, बशारत पीर, एनी जैदी और अमन सेठी ने अंग्रेजी में गल्प से इतर लेखन की चुनौतियों की चर्चा की। इन लेखकों ने बताया कि भारतीय लेखक के लिए एक प्रमुख चुनौती संसाधनों की उपलब्धता की भी है। भारतीय प्रकाशन समूह लेखकों को इस तरह का आर्थिक सहयोग नहीं देते कि लेखक अपने विषय पर अनुसंधान के लिए समय निकाल सकें। इन लेखकों ने अनुवाद की चुनौतियों की भी चर्चा की। सत्र का संचालन करतु हुए चंद्रहास चैधरी ने कहा कि समन्वय ने एक ऐसा मंच उपलब्ध कराया है जिस पर विभिन्न भारतीय भाषाओं के लेखक एक मंच पर आकर चर्चा कर सकें। इस सत्र में अरुंधती सुब्रमण्यम ने अपनी कविताओं का और राहुल पंडिता ने अपनी किताब ‘हलो बस्तर’ के अंश का पाठ किया।

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